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संघ का लोकतंत्र बनाम कॉन्ग्रेस पार्टी प्राइवेट लिमिटेड- संस्कार कहाँ से लाओगे?


कॉन्ग्रेस पार्टी बेशक ‘संघ’ से पुरजोर नफरत करती हो, लेकिन वह संघ के मायने और ताकत भी समझती है, और इसीलिए एक संघ जैसा ही संगठन कॉन्ग्रेस पार्टी में भी चलता है, जिसे ‘सेवा दल’ के नाम से जाना जाता है।

लेकिन सब कुछ चाहत, लालच और महत्वकांक्षाओं से ही नहीं होता, कुछ बातों और इरादों को फलीभूत करने के लिए ‘संस्कारों’ की भी जरूरत होती है, जो कि नेहरू-गाँधी परिवार को छू कर भी नहीं गए।

यही वजह है कि लगभग आरएसएस के साथ ही स्थापित हुआ ‘सेवा दल’ का आज मात्र इतना काम रह गया है है कि इसका अध्यक्ष कॉन्ग्रेस के स्थापना दिवस के दिन, कॉन्ग्रेस के मुख्यालय में, कॉन्ग्रेस पार्टी के अध्यक्ष बल्कि गाँधी परिवार के वारिस को सूत की माला पहनाता है और उन्हें सलामी देता है, बाकी साल भर इसका अध्यक्ष और इनका संगठन, कॉन्ग्रेस शासित राज्यों में दलाली और उगाही करता है।

जबकि संघ की ताकत और सिस्टम देखिए कि आज अगर भाजपा, कॉन्ग्रेस पार्टी की तरह एक वंश से संचालित पार्टी नहीं बन सकी है तो उसके मूल में संघ का ‘अंकुश’ है। संघ का मुखिया कभी भाजपा मुख्यालय में भाजपा अध्यक्ष को सैल्यूट मारने नहीं जाता है, बल्कि आवश्यकता होने पर वही संघ के दरवाजे पर जाता है, क्योंकि वह उसका घर है और उसका संस्कार है।

आज भारत के किसी भी राज्य में देख लीजिए, भाजपा का कोई भी नेता पार्टी और संघ से ताकतवर नहीं है। किसी भी नेता में इतनी ताकत और साहस नहीं है कि पार्टी को जागीर की तरह चला सके, जैसा कि कॉन्ग्रेस में होता है।

वहीं कॉन्ग्रेस में उत्तर से लेकर दक्षिण और पूर्व से लेकर पश्चिम तक भारत में जितने भी राज्य हैं, वहाँ पार्टी को एक प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी की तरह वह नेता चला रहे हैं, जिन्हें दिल्ली स्थित 10 जनपथ नामक शक्ति पीठ से अभयदान हासिल है। या, यूँ कह लीजिए कि जो थैलियाँ भेजते रहने के बावजूद, गाँधियों की खड़ाऊँ सर पर ढो सकता है, और जहाँ ऐसे लोग नहीं बचे वहाँ कॉन्ग्रेस लगभग खत्म हो चुकी है।

पर भाजपा में ऐसा नहीं हैं, यहाँ एक साधारण कार्यकर्ता नेता बन सकता है, नेता से क्षत्रप, क्षत्रप से राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रधानमंत्री तक बन सकता है, लेकिन वह चाहकर भी पार्टी को हायजैक नहीं कर सकता है, चाहे वह कितना भी कद्दावर बना रहे। वह चाहकर भी पार्टी के शीर्ष पदों को बाकी दलों की तरह अपने परिवार के सदस्यों के लिए रिजर्व नहीं कर सकता।

इसलिए जबकि इन दिनों लाल कृष्ण आडवाणी जी को टिकट न दिए जाने पर जो रार मची है, खासकर उन लोगों में जो आडवाणी को तो फूटी आँख पसंद नहीं करते लेकिन इस बहाने मोदी और भाजपा को घेरने की कोशिश कर रहे हैं; वह इसी बात को प्रमाणित करती है कि बेशक आडवाणी जी पार्टी के आधार स्तम्भ हैं, लेकिन वह पार्टी नहीं हैं, बल्कि भाजपा और संघ की स्थापना के मूल में जो राष्ट्र, सनातन और भारत का विचार हैं। वे उस विचार के एक कर्मठ वाहक थे और उसी विचार के तहत उनको विश्राम देने का निर्णय पार्टी ने सर्वसम्मति से लिया।

अगर वे पार्टी से बड़े होते तो आज उनके परिवार की तीसरी पीढ़ी राजनीति में होती, उनके परिवार से ही पार्टी के पदाधिकारी और पीएम चुने जाते। और तब यह राजनीति नहीं बल्कि विकृति कहलाता, जो कि इस दौर में हम कॉन्ग्रेस सहित बाकी क्षेत्रीय दलों के भीतर देख रहे हैं।

पर भाजपा में यह विकृति नहीं पनपी है, तो उसके मूल में संघ का हाथ है। संघ जो भाजपा को वैचारिक और नैतिक ऊर्जा प्रदान करता है। जैसा कि संघ के बारे में कहा जाता है, कि वह एक राजनीतिक संगठन न होकर, एक सांस्कृतिक संगठन है, क्योंकि संघ के लोग संघ में रहने के दौरान राजनीतिक हसरतें नहीं पालते, अगर उन्हें राजनीति करना है तो वे संघ और भाजपा की मर्जी से राजनीति की मुख्यधारा में आते हैं।

संघ ने अपना यह चरित्र उस दौर में विकसित किया जब वह दशकों तक देश में कॉन्ग्रेस, वामपंथियों और सेक्युलरों के निशाने पर रहा, जब उसको खत्म करने और बदनाम करने के अनेकों षड्यंत्र हुए। लेकिन संघ के बरक्स कॉन्ग्रेस का ‘सेवा दल’ आज एक परिवार के सामने घुटनों के बल उन स्थितियों के बावजूद है, जबकि उसके पास अपने वैचारिक, नैतिक और सांस्कृतिक उत्थान के असीमित अवसर थे। लेकिन फिर सवाल वही ‘मंशा’ और ‘नीयत’ का है।

पुनश्च: कल कॉन्ग्रेस पार्टी के सर्वगुण सम्पन्न प्रवक्ता और राफेल मामलों के विशेषज्ञ रणदीप सुरजेवाला ने मीडिया में सबूतों के साथ आरोप लगाया कि 2009 में कर्नाटक के मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा ने भाजपा के शीर्ष नेताओं को जिनमें आडवाणी, अरुण जेटली, राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी के नाम शामिल हैं, उनको कुल 1800 करोड़ रुपए की रिश्वत दी गई। खैर सबूतों के ‘अकाट्य’ होने के बारे में क्या बात की जाए, जबकि यह रिश्वत राउंड फिगर में है और रिश्वत विवरण के प्रत्येक पेज के नीचे रिश्वत देने वाले ने अपने हस्ताक्षर भी किए हुए हैं, ताकि वह कभी पकड़ा जाए तो उसकी जमानत भी न हो सके।

लेकिन मैं यहाँ कुछ और बात करना चाहता हूँ कि 1800 करोड़ रुपए देने के बाद भी, और उन नेताओं के देने के बाद भी जो भाजपा के शीर्ष पदों पर हैं, येदियुरप्पा जी भी आज पार्टी और संगठन से बड़े नहीं हो सके हैं, पार्टी में उनकी हस्ती और हैसियत उनके कर्मानुसार ही है।

हालाँकि, उन्होंने बड़ा बनने की कोशिश की थी; पार्टी छोड़ कर गए थे, असलियत पता चल गई और वापस आ गए और अब सहर्ष आडवाणी जी के क्लब में शामिल होने को तैयार हैं। इसलिए भाजपा के बारे में सोचिए, भाजपा की बात कीजिए। यह सच मायने में पार्टी विथ डिफ़रेंस है।

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