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ई बार बांग्ला

इस बार चुनावी अभियान का असली रंग उत्तर प्रदेश में नहीं पश्चिम बंगाल में देखने को मिल रहा है। बंगाल में जहां एक तरफ बीजेपी का चुनावी ग्राफ ऊपर उठ रहा है, वहीं तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बैनर्जी सुध-बुध खोकर संवैधानिक मर्यादाओं को तार-तार करने का मौका नहीं छोड़ रही हैं। आखिर क्या वजह है कि ममता बीजेपी से इतनी डरी हुई हैं?

रविवार शाम को एक ऐसी घटना हुई जो लोकतंत्र को शर्मसार करने वाली थी। दरअसल कोलकाता के पुलिस आयुक्त राजीव कुमार से पूछताछ करने सीबीआई के अधिकार वहां गये, जिनको हिरासत में लेकर थाने में बिठा दिया गया। जो तस्वीरें सामने आईं उनमें ऐसा दिख रहा है कि बंगाल की कोलकाता पुलिस सीबीआई अधिकारी के साथ अनुदार ढंग से पेश आ रही है।

इस मामले में खुद को बैकफुट पर जाते देख ममता ने इसे राजनीतिक रंग देते हुए अराजकता की राजनीति शुरू कर दी। अब मामला अदालत में है।

केंद्र और राज्य के बीच की यह रार पहले से चल रही है। इसके पहले पश्चिम बंगाल के झारग्राम में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के हेलिकॉप्टर को उतारने की इजाजत नहीं दी गयी। मालदा में भी शाह के साथ ऐसा ही होता है, जहाँ उन्हें हेलीकाप्टर उतारने की इजाजत नहीं मिलती है।

पुरुलिया और बांकुरा में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी को भी हेलीकाप्टर उतारने की अनुमति नहीं मिली। जिसकी वजह से योगी को फ़ोन के ज़रिये रैली को संबोधित करना पड़ता है। इस लिहाज बंगाल की ममता बैनर्जी सरकार पर सवाल उठने लाजिमी हैं। क्या लोकतंत्र में किसी सत्ताधारी दल के खिलाफ दूसरे को जनसभा करने से भी रोका जाएगा ?

किसी भी राज्य में राजनीतिक दलों को चुनावी रैली का अधिकार प्राप्त है। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी ने कहा है कि सभी दलों को चुनावी कार्यक्रम करने का अधिकार है, इसमें किसी भी तरह का भेदभाव नहीं किया जा सकता है।

राज्यपाल ने किसी ख़ास दल का नाम नहीं लिया लेकिन उनके और ममता बनर्जी के बीच बीजेपी की सभाओं में अड़ंगा लगाने को लेकर पहले भी विवाद हो चुका है। राज्यपाल ने पहले इस बात पर भी आपत्ति उठाई थी जब पश्चिम बंगाल सरकार ने भाजपा को राज्य में रथयात्रा निकालने की अनुमति नहीं दी थी। भारतीय जनता पार्टी की यह रथयात्रा राज्य के सभी सभी 42 संसदीय क्षेत्रों से गुजरने वाली थी।

इन घटनाओं की ज़िक्र करना यहाँ इसलिए ज़रूरी है क्योंकि बीजेपी ने पिछले कुछ सालों में पश्चिम बंगाल में अपनी पहचान प्रमुख विपक्षी दल के तौर पर बनाई है।

वर्ष 2016 में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने महज तीन सीटें जीतकर बहुत अच्छा प्रदर्शन तो नहीं किया लेकिन मई में संपन्न हुए पंचायत चुनाव में बीजेपी ने बेहतर प्रदर्शन करते हुए प्रमुख विपक्षी दल का स्थान जरूर कब्ज़ा लिया। इसके अलावा बीजेपी ने पिछले दो सालों में हुए तमाम उपचुनावों में दूसरा स्थान हासिल किया है।

ममता बनर्जी एनआरसी को बड़ा मुद्दा बनाकर इसे “बंगाली अस्मिता” से जोड़ना चाहती हैं। ममता बनर्जी ने कहा कि एनआरसी से बाहर हुए 24 लाख लोग बंगाली हिन्दू हैं ।

बीजेपी भी तृणमूल कांग्रेस के नेताओं पर बाहरी लोगों को लेकर लगातार हमले के मूड में है। बंगाल का भद्रलोक (मध्य वर्ग ) भी ममता के झूठे वादों से परेशान हो चुका है।


वर्ष 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 16 फीसद वोट शेयर हासिल किया, हालाँकि 2016 के विधानसभा चुनाव में यह घटकर 10 फीसद हो गया था। लेकिन पासा एकबार फिर पलट चुका है। गत वर्ष पार्टी ने पंचायत चुनावों में ज़बर्दस्त मुकाबला करते हुए 18 फीसद वोट शेयर हासिल किया और कम्युनिस्ट और कांग्रेस को पीछे छोड़ दिया।

पश्चिम बंगाल के झारग्राम में जहाँ बीजेपी ने 40 फीसद ग्राम पंचायत सीटों पर जीत हासिल की, वहीं पुरुलिया में 33 फीसद सीटें हासिल की। टीएमसी तमाम कोशिशों के बावजूद बीजेपी को यहाँ रोकने में नाकाम रही।

बीजेपी का निशाना सिर्फ़ ये लोकसभा चुनाव नहीं है, लोकसभा के बाद 2020 में निगम चुनाव हैं और उसके अगले साल यानी 2021 में विधान सभा चुनाव भी हैं। ममता बनर्जी की चिंता की असली वजह यही है। बंगाल में कम्युनिस्ट दलों का सूरज ढल चुका है, कांग्रेस यहाँ कब की नाउम्मीद हो चुकी है।

ममता बनर्जी ने पिछली बार ‘पोरिबोर्तन’ के नाम पर बंगाल में जीत हासिल की थी, लेकिन बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह “ई बार बांग्ला” का नारा देकर ममता की नींद और चैन ख़राब कर चुके हैं। अत: यह चर्चा जोरो पर है कि त्रिपुरा से ‘पलटाव’ की जो बयार चली है, वह अब बंगाल में ‘ई बार बांग्ला’ बनकर ममता के किले को ध्वस्त न कर दे! क्योंकि किले में सेंध तो भाजपा पहले ही लगा चुकी है।

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