सन् 1946 में चुनाव के पश्चात् कांग्रेस में चार वर्ष से पदासीन श्री मौलाना आजाद के स्थान पर अध्यक्ष पद पर चयन होना था। इतना तो निश्चित ही था कि कांगे्रस अध्यक्ष के रूप में जिस नियुक्ति होगी, वह आनेवाली कामचलाऊ केन्द्रीय सरकार में प्रधानमंत्री भी होगा। कांग्रेस अध्यक्ष की नियुक्ति के लिए तत्कालीन नीति – नियमों के अनुसार प्रांतीय समितियां जिस नामों का सुझाव दें उनमें से जिसे सर्वाधिक समर्थन प्राप्त हो उसी की अध्यक्ष पद पर नियुक्ति की जाए, ऐसी परंपरा थी। उस समय 15 प्रांतीय समितियों का अस्तित्व था। इन 15 में से 12 समितियों ने नए कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में और उस प्रकार देश के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में सरदार के नाम का सुझाव दिया था। 3 प्रांतीय समितियों ने आचार्य कृपलानी का नाम प्रस्तावित किया था। जवाहरलाल के नाम का सुझाव किसी भी प्रांतीय समिति ने नहीं दिया था। कांग्रेस के संविधान के अनुसार प्रांतीय समितियों द्वारा दिए गये सुझाव के अलावा कारोबारी का कोई सदस्य भी स्वतंत्र रूप से सुझाव दे सकता था। ऐसे सुझाव के बाद अधिकांश अन्य प्रत्याशी अपना नाम वापस ले लेते और निर्विरोध चुनाव हो जाते, ऐसी परंपरा थी। गांधी जी ने कृपलानी द्वारा कार्यसमिति की बैठक में जवाहरलाल के नाम का प्रस्ताव रखवाया। बैठक का प्रारंभ होते ही सबसे पहले गांधी जी ने जवाहरलाल को लक्ष्य करके कहा कि किसी भी प्रांतीय समिति ने आपके नाम का सुझाव नहीं दिया है। कारोबारी में कृपलानी ने आपका नाम प्रस्तावित किया है। इस विषय में आप क्या कहना चाहते हैं? जवाहरलाल मौन रहे। इसके पश्चात गांधी जी ने सरदार की ओर देखते हुए कहा , ’ सरदार 15 में से 12 प्रांतीय समितियों ने आपके नाम का सुझाव दिया है। कारोबारी में जवाहरलाल के नाम का प्रस्ताव रखा गया है, आप क्या कहना चाहते हैं? सरदार ने बिना कुछ बोले कृपलानी के प्रस्ताव पत्र पर तत्काल हस्ताक्षर कर दिए और इस प्रकार जवाहरलाल कांगे्रस अध्यक्ष एवं देश के प्रधानमंत्री भी बन गए।
हजारों साल पहले अयोध्या की प्रजा द्वारा अपने राजकुमार श्रीराम का राज्याभिषेक करना तय किया लेकिन श्रीराम ने पिता के कहने से राज्य त्याग दिया था। एक बार फिर इतिहास की यह घटना कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में दोहरायी गयी। 12 प्रदेश कांग्रेस कमेटियों द्वारा सरदार के मस्तक पर रखा प्रधानमंत्री पद का मुकुट सरदार ने स्वयं श्रीराम की तरह ही पिता तुल्य गांधी के कहने पर त्याग दिया। देश की एकता, अखण्डता, सुरक्षा , विकास एवं समपन्नता उनके लिए जीवनभर सर्वोपरि रही।
हजारों साल पहले अयोध्या की प्रजा द्वारा अपने राजकुमार श्रीराम का राज्याभिषेक करना तय किया लेकिन श्रीराम ने पिता के कहने से राज्य त्याग दिया था। एक बार फिर इतिहास की यह घटना कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में दोहरायी गयी। 12 प्रदेश कांग्रेस कमेटियों द्वारा सरदार के मस्तक पर रखा प्रधानमंत्री पद का मुकुट सरदार ने स्वयं श्रीराम की तरह ही पिता तुल्य गांधी के कहने पर त्याग दिया। देश की एकता, अखण्डता, सुरक्षा , विकास एवं समपन्नता उनके लिए जीवनभर सर्वोपरि रही।

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