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किसानों के मुद्दे पर कांग्रेस का वही पुराना रूप सामने आया


आखिरकार किसान आंदोलन खत्म हुआ, लेकिन जिस तरह कांग्रेस नेतृत्व ने अपना घिनौना व्यवहार सामने लाया, उसने एक बार फिर सोचने को मजबूर कर दिया है कि देश में केंद्र सरकार के खिलाफ ऐसे ही दिग्भ्रमित करने का कार्य चलता रहा तो ये देश के विकास के लिए बाधा उत्पन्न कर सकता है। देश ने 70 वर्षों का कुशासन देखा है। देश ने ऐसे-ऐसे किसान आंदोलन को देखा है जब यूपीए सरकार को जवाब देते नहीं बनता था। जो कांग्रेस 2009 के लोकसभा चुनाव में 262 सीटों पर काबिज थी, वह 2014 के चुनाव में 59 सीटों पर आ टिकी है। इससे कांग्रेस को सबक लेना चाहिए था। देश की प्रगति में अपना योगदान करना चाहिए था, लेकिन कांग्रेस ने हमेशा रोड़े अटकाने का ही काम किया है।

 देश की जनता पिछले 70 सालों  का ज़ख़्म अभी तक झेल रही है। उस ज़ख़्म को मिटने में और घाव भरने में कुछ वक़्त तो लगेगा, देश की जनता जानती है की कौन उन्हें लूट रहा था और कौन उनकी सेवा कर रहा है। पहले किसान मांग करने नहीं आते थे, क्योंकि उन्हें देश के नेताओं से कोई आशा ही नहीं थी। पर अब देश की जनता जानती है कि अगर उन्होंने कुछ कहा तो उनकी सुनी जाएगी। आजाद भारत में पहली बार ‘अन्नदाता किसान’ के अभिप्राय को अगर किसी ने स्पष्ट किया है तो वह देश के माननीय प्रधानमंत्री आदरणीय श्री नरेंद्र मोदी जी हैं।

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