आज बापू की जयंती है। आज हमें देश के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को तय करना चाहिए कि हमें किस दिशा में जाना है। महात्मा गांधी व्यक्ति विशेष के स्वभाव पर कहते थे कि विश्वास करना वास्तव में एक गुण है। अविश्वास तो दुर्बलता की जननी है। वह धन संचय करने के विषय पर कहते थे कि जो समय बचाते हैं, वो धन बचाते हैं। बचाया हुआ धन हमारे कमाए हुए धन के बराबर है। और ये सच भी है। वह कहते थे कि अपने प्रयोजन में विश्वास रखने वाला एक सूक्ष्म शरीर इतिहास के रुख को बदल सकता है। आज जिस तरह लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी का दुरूपयोग हो रहा है, उस पर बापू कहते थे कि मौन की ताकत समझिए। मौन ही सबसे सशक्त भाषण है। धीरे-धीरे दुनिया आपको सुनेगी।
आज छात्रों के सामने अक्सर पढ़ाई को लेकर जिस तरह डर समाया रहता है, उस पर बापू ने अपना मंतव्य दिया था। वह कहते थे कि डर क्या है? ये तो शरीर की बीमारी नहीं है। यह हमारी आत्मा को मारता है। जिस तरह प्रतिशोध की भावना में आज हर कोई कार्य करता है, उस पर भी बापू कहते थे कि अगर आंख के बदले आंख की सोच को बदला ना गया तो यह एक दिन समूचे विश्व को ही अंधा बना देगी।
जाहिर सी बात है, प्रसन्नता ही एक मात्र ऐसा इत्र है, जिसे अगर आप दूसरों पर छिड़केंगे तो कुछ बूंदें आप पर भी गिरेंगी। हमेशा याद रखिए। किसी भी व्यक्ति की पहचान उसके कपड़ों से नहीं होती। उसके चरित्र से होती है। हो सकता है कि आप जो कर रहे हों वो महत्व अल्प हो यानी कम हो। लेकिन, सबसे ज्यादा अगर कुछ महत्वपूर्ण है तो वो ये कि आप कुछ करें।
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