असम में 30 जुलाई, 2018 को राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) का अंतिम ड्रॉफ्ट जारी कर दिया गया। यहां यह समझने की आवश्यकता है कि आखिर एनआरसी है क्या? दरअसल, एनआरसी से पता चलता है कि कौन भारतीय नागरिक है और कौन नहीं। जिनके नाम इसमें शामिल नहीं होते हैं, उन्हें अवैध नागरिक माना जाता है।
जाहिर है, 1947 में बंटवारे के बाद असम के लोगों का पूर्वी पाकिस्तान में आना-जाना जारी रहा। इसके हिसाब से 25 मार्च, 1971 से पहले असम में रह रहे लोगों को भारतीय नागरिक माना गया है। असम पहला राज्य है जहां भारतीय नागरिकों के नाम शामिल करने के लिए 1951 के बाद एनआरसी को अपडेट किया जा रहा है। एनआरसी का पहला मसौदा 31 दिसंबर और एक जनवरी की रात जारी किया गया था, जिसमें 1.9 करोड़ लोगों के नाम थे। असम में बांग्लादेश से आए घुसपैठियों पर बवाल के बाद सुप्रीम कोर्ट ने एनआरसी अपडेट करने को कहा था। पहला रजिस्टर 1951 में जारी हुआ था। ये रजिस्टर असम का निवासी होने का सर्टिफिकेट है। इस मुद्दे पर असम में कई बड़े और हिंसक आंदोलन हुए हैं।
1979 में असम में घुसपैठियों के खिलाफ ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन ने आंदोलन किया। इसके बाद 1985 को तब की केंद्र में राजीव गांधी सरकार ने असम गण परिषद से समझौता किया। इसके तहत 1971 से पहले जो भी बांग्लादेशी असम में घुसे हैं, उन्हें भारत की नागरिकता दी जाएगी। हालांकि इस पर काम शुरू नहीं हो सका। 2005 में जाकर कांग्रेस सरकार ने इस पर काम शुरू किया। 2015 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर इसमें तेजी आई। इसके बाद असम में नागरिकों के सत्यापन का काम शुरू हुआ। राज्यभर में एनआरसी केंद्र खोले गए। असम का नागरिक होने के लिए वहां के लोगों को दस्तावेज सौंपने थे।अब सवाल ये है कि जिनके नाम इसमें नहीं हैं उनका क्या होगा? दरअसल अभी उनके पास एक और मौका है। छूटे हुए लोग फिर से इसमें शामिल होने के लिए अप्लाई कर सकते हैं। इसके लिए उनके पास 30 अगस्त से 28 सितंबर तक समय है। माननीय गृह मंत्री आदरणीय श्री राजनाथ सिंह ने भी कहा कि हो सकता है कि कुछ लोग अनिवार्य दस्तावेज जमा ना करा पाए हों तो उन्हें दावों और आपत्तियों की प्रक्रिया के जरिए पूरा मौका दिया जाएगा। दावों और आपत्तियों के निस्तारण के बाद ही अंतिम एनआरसी जारी किया जाएगा और यहां तक कि इसके बाद भी हर व्यक्ति को विदेशी न्यायाधिकरण का दरवाजा खटखटाने का मौका मिलेगा। अंतिम एनआरसी 31 दिसंबर से पहले जारी की जा सकती है।
सवाल है जब इतना निष्पक्ष विषय है एनआरसी, फिर इसे क्यों राजनीतिक मुद्दा बनाया जा रहा है। मैं देश के हर धर्म के अनुयायी तमाम मुसलमान भाई-बहनों से यही कहना चाहता हूं कि आप इस तथ्य को समझें और गहराई से जानें… सरकारी को दिग्भ्रमित करने के लिए समाज को बहकाने की कोशिश की जा रही है… आप गंभीरता से विचार करें, आप खुद विपक्षी दलों की सच्चाई से वाकिफ हो जाएंगे। लेकिन हम देशवासी देश की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं कर सकते…
जाहिर है, 1947 में बंटवारे के बाद असम के लोगों का पूर्वी पाकिस्तान में आना-जाना जारी रहा। इसके हिसाब से 25 मार्च, 1971 से पहले असम में रह रहे लोगों को भारतीय नागरिक माना गया है। असम पहला राज्य है जहां भारतीय नागरिकों के नाम शामिल करने के लिए 1951 के बाद एनआरसी को अपडेट किया जा रहा है। एनआरसी का पहला मसौदा 31 दिसंबर और एक जनवरी की रात जारी किया गया था, जिसमें 1.9 करोड़ लोगों के नाम थे। असम में बांग्लादेश से आए घुसपैठियों पर बवाल के बाद सुप्रीम कोर्ट ने एनआरसी अपडेट करने को कहा था। पहला रजिस्टर 1951 में जारी हुआ था। ये रजिस्टर असम का निवासी होने का सर्टिफिकेट है। इस मुद्दे पर असम में कई बड़े और हिंसक आंदोलन हुए हैं।
1979 में असम में घुसपैठियों के खिलाफ ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन ने आंदोलन किया। इसके बाद 1985 को तब की केंद्र में राजीव गांधी सरकार ने असम गण परिषद से समझौता किया। इसके तहत 1971 से पहले जो भी बांग्लादेशी असम में घुसे हैं, उन्हें भारत की नागरिकता दी जाएगी। हालांकि इस पर काम शुरू नहीं हो सका। 2005 में जाकर कांग्रेस सरकार ने इस पर काम शुरू किया। 2015 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर इसमें तेजी आई। इसके बाद असम में नागरिकों के सत्यापन का काम शुरू हुआ। राज्यभर में एनआरसी केंद्र खोले गए। असम का नागरिक होने के लिए वहां के लोगों को दस्तावेज सौंपने थे।अब सवाल ये है कि जिनके नाम इसमें नहीं हैं उनका क्या होगा? दरअसल अभी उनके पास एक और मौका है। छूटे हुए लोग फिर से इसमें शामिल होने के लिए अप्लाई कर सकते हैं। इसके लिए उनके पास 30 अगस्त से 28 सितंबर तक समय है। माननीय गृह मंत्री आदरणीय श्री राजनाथ सिंह ने भी कहा कि हो सकता है कि कुछ लोग अनिवार्य दस्तावेज जमा ना करा पाए हों तो उन्हें दावों और आपत्तियों की प्रक्रिया के जरिए पूरा मौका दिया जाएगा। दावों और आपत्तियों के निस्तारण के बाद ही अंतिम एनआरसी जारी किया जाएगा और यहां तक कि इसके बाद भी हर व्यक्ति को विदेशी न्यायाधिकरण का दरवाजा खटखटाने का मौका मिलेगा। अंतिम एनआरसी 31 दिसंबर से पहले जारी की जा सकती है।
सवाल है जब इतना निष्पक्ष विषय है एनआरसी, फिर इसे क्यों राजनीतिक मुद्दा बनाया जा रहा है। मैं देश के हर धर्म के अनुयायी तमाम मुसलमान भाई-बहनों से यही कहना चाहता हूं कि आप इस तथ्य को समझें और गहराई से जानें… सरकारी को दिग्भ्रमित करने के लिए समाज को बहकाने की कोशिश की जा रही है… आप गंभीरता से विचार करें, आप खुद विपक्षी दलों की सच्चाई से वाकिफ हो जाएंगे। लेकिन हम देशवासी देश की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं कर सकते…

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