केंद्र सरकार कर्मियों के लिए यह प्रसन्नता का विषय है कि आजादी के 71 साल बाद केंद्र सरकार के 48 लाख कर्मचारियों को विदेश भ्रमण का अवसर मिलने जा रहा है। मौजूदा व्यवस्था के तहत ये कर्मचारी अवकाश यात्रा रियायत (एलटीसी) के जरिए केवल अपने देश में ही घूम-फिर सकते हैं। मैं इस विषय को दूसरे नज़रिए से भी देखता हूं। जब हम आधुनिक भारत की बात करते हैं तो उसमें केवल आधुनिक समाज ही नहीं, बल्कि उस समग्रता का बोध होता है, जहां सबका साथ, सबका विकास समाहित होता है। ऐसे विदेशी दौरे से निस्संदेह किसी का बौद्धिक विकास होता है और उसका कार्यान्वयन उसी दृष्टिकोण से होता है। खास बात है कि एलटीसी के नए नियम जो कि अगले दो-तीन माह में लागू हो जाएंगे, उनके अंतर्गत किसी भी विभाग में चपरासी से लेकर अधिकारी तक सभी विदेश भ्रमण के योग्य होंगे। इसे वित्त मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय से औपचारिक मंजूरी मिल चुकी है। केवल इस पर मुहर लगना शेष है। नई नीति में फिलहाल मध्य एशिया के पांच देश उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, तजाकिस्तान, किर्गिस्तान और कजाखस्तान को शामिल किया गया है।
आज सुबह सुबह मध्य प्रदेश की एक ऐसी खबर पर नजर गई जो कांग्रेस एवं तमाम विपक्षी दलों के झूठ और किसानों को दिए झाँसे की पोल खोल कर रख देती है... झूठ के बल पर जहां कांग्रेस ने हाल में कुछ राज्यों में सरकारें बना ली, वहीं जब सच में किसानों का कर्ज माफी की बात सामने आ रही है तो नतीजा गोलमाल और हेराफेरी सा प्रतीत हो रहा है... मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले में किसान ऋण माफी की प्रक्रिया शुरू होते ही 76 कृषि साख सहकारी समितियों में हुए घोटाले की परतें खुलने लगी हैं। समितियों की ओर से पंचायत पर ऋणदाताओं की सूची चस्पा की तो ऐसे किसान सामने आए, जिन्होंने ऋण लिया ही नहीं, लेकिन वह कर्जदार हैं। किसानों ने जिला सहकारी केंद्रीय बैंक की शाखा व समितियों पर पहुंच कर आपित्त दर्ज कराई है। किसानों का कहना है कि जब बैंक से कर्ज लिया ही नहीं तो माफी कैसी? जिला सहकारी केंद्रीय बैंक की ओर से किसानों को फसल के लिए ऋण साख सहकारी समितियों के माध्यम से दिया जाता है। पिछले दस साल में बिना कागजी कार्रवाई किए 120 करोड़ का फर्जी ऋण वितरण किया गया। वर्ष 2010 में ऋण वितरण घोटाला सामने आया था, लेकिन तत्कालीन भाजपा...

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